व्यक्तियों का दुर्व्यापार (निवारण संरक्षण तथा पुनर्वास) विधेयक सरकार द्वारा 18 जुलाई, 2018 को लोकसभा में पेश किया, जिसे सदन ने 26 जुलाई, 2018 को पारित कर गया। यह विधेयक व्यक्तियों के दुर्व्यापार को रोकने, संरक्षण देने तथा पुनर्वास को सुनिश्चित करता है। यह विधेयक विभागों, राज्य सरकारों तथा गैर-सरकारी संगठनों से परामर्श कर बनाया गया है। यह विधेयक अपराधियों को लक्षित करता है न कि पीड़ितों को। यह विधेयक पीड़ितों के लिए एक दयालु दृष्टिकोण रखता है।
इस विधेयक के मुख्य बिंदु हैं
* यह विधेयक व्यक्तियों के दुर्व्यापार के निवारण, संरक्षण तथा पुनर्वास संबंधी प्रावधान करता है।
* दुर्व्यापार के गंभीर रूप जिसमें सम्मिलित हैंµजबरन मजदूरी कराना, भीख मंगवाना, किसी प्रकार के रसायन या हार्मोन जिससे समय-पूर्व यौन परिपक्वता प्राप्त की जा सके, का प्रयोग कर किया जाने वाला दुर्व्यापार, महिला या बच्चों का दुर्व्यापार, विवाह के उद्देश्य से या विवाह के बहाने दुर्व्यापार।
* विधेयक ऐसे व्यक्ति के लिए दंड का प्रयोजन करता है जो किसी व्यक्ति को दुर्व्यापार के लिए प्रोत्साहित करता है तथा ऐसे फर्जी दस्तावेजों का निर्माण, प्रिंट या उपलब्ध कराता है जो कि सरकार द्वारा मांगे गए हों; या सरकारी अपेक्षाओं की अनुपालना के सबूत के रूप में जारी न किए गए, गड़बड़ किए गए या नकली प्रमाण-पत्रों, पंजीकरण या स्टीकरों को उत्पन्न, मुद्रित, जारी या वितरित करता है।
* ऐसे व्यक्ति के लिए दंड का प्रयोजन जो कि प्रतिफल के बदले किसी व्यक्ति को खरीदता या बेचता है। अश्लील फोटो-चित्रों या वीडियो लेने, वितरित करने या सामग्री उपलब्ध कराने की याचना करता है।
* विधेयक सुनिश्चित करता है कि पीड़ित/साक्षी की पहचान उजागर न हो। पीड़ित की पहचान उजागर न होने देने के उद्देश्य से पीड़ित का बयान वीडियो कान्फ्रेंसिंग के द्वारा रिकॉर्ड करना। (यह सीमा पार तथा अंतरराज्य अपराधों के लिए भी सहयोग प्रदान करता है।
* अभिहित न्यायालय, जहां तक संभव हो, इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का संज्ञान लेने की तारीख से एक वर्ष की अवधि के भीतर विचारण को पूरा करेगा।
* पीड़ितों का तत्काल संरक्षण तथा उनका पुनर्वास। पीड़ित तीस दिनों के भीतर राहत पाने के अधिकारी हैं जिससे वो शारीरिक, मानसिक आघातों से उबर सकें तथा चार्जशीट भरे जाने के साठ दिन के भीतर अन्य राहत पाने के अधिकारी हैं।
* पहली बार पुनर्वास निधि गठित की गई है जिसका प्रयोग पीड़ित के शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक उत्थान के लिए किया जाएगा जिसमें शिक्षा, कौशल विकास, स्वास्थ्य की देखभाल, मानसिक सहायता, कानूनी सहायता तथा सुरक्षित आवास प्रदान करना सम्मिलित हैं।
* इन मामलों की सुनवाई के लिए प्रत्येक जिले में अभिहित न्यायालय सुनिश्चित किए जाएंगे जो एक वर्ष के भीतर ट्रायल पूरा करेंगे।
* यह विधेयक जिला, राज्य तथा केंद्र स्तर पर समर्पित संस्थागत तंत्रा निर्मित करता है। यह तंत्रा दुर्व्यापार से संबंधित निवारण, संरक्षण तथा पुनर्वास के लिए उत्तरदायी होगा। राष्ट्रीय जांच एजेन्सी ‘एंटी ट्रैफिकिंग ब्यूरो’ का कार्य संभालेगी जो कि गृह मंत्रालय के अंतर्गत है।
* यह विधेयक कठोर दंड का प्रावधान करता है जिसमें दस साल के कारावास से लेकर पूरे जीवन काल का कारावास हो सकता है तथा आर्थिक दंड एक लाख रुपये से कम नहीं होगा। किसी भी ऐसी सामग्री को प्रकाशित करने जिससे किसी व्यक्ति के दुर्व्यापार को बढ़ावा मिले, दण्डनीय होगा, जिसमें 5 से 10 वर्षों का कारावास और 50,000 से एक लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है।
* इस संगठित अपराध को समाप्त करने के लिए, चाहे वह राष्ट्रीय स्तर पर हो या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, विधेयक संपत्ति की कुर्की तथा जब्ती का भी प्रावधान करता है।
* विधेयक इस अपराध के बहुद्देशीय विस्तार को भी संबोधित करता है। नेशनल एंटी ट्रैफिकिंग ब्यूरो अन्य देशों के अधिकारियों तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों के सहयोग से कार्यों का निष्पादन करेगा। यह ब्यूरो अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जांच करेगा; राज्यों के बीच तथा सीमापार साक्ष्यों तथा गवाहों के आदान-प्रदान का कार्य करेगा तथा कानूनी प्रक्रिया में अंतरराज्यीय तथा अंतरराष्ट्रीय वीडियो कॉन्फ्रेसिंग की व्यवस्था करेगा।
* नेशनल एंटी ट्रैफिकिंग ब्यूरो इस विधेयक के अंतर्गत किसी भी ऐसे अपराध की जांच करेगा जिसे दो या दो से अधिक राज्यों द्वारा इसके पास भेजा जाएगा।
* ब्यूरो किसी अपराध की जांच हेतु राज्य सरकार से सहयोग के लिए प्रार्थना कर सकता है या मामले का किसी राज्य में स्थानांतरण के लिए अपेक्षा कर सकता है जोकि केंद्र सरकार के अनुमोदन से संभव हो सकेगा।
* यह विधेयक प्रावधान करता है कि राज्य सरकार द्वारा एक नोडल अधिकारी की नियुक्ति की जाएगी जो कि राज्य की एंटी ट्रैफिकिंग कमेटी द्वारा निर्दिष्ट कार्यों को पूर्ण करेगा। राज्य सरकार राज्य तथा जिला स्तरों पर पुलिस नोडल अधिकारी की नियुक्ति भी करेगी। ये एंटी ट्रैफिकिंग पुलिस अधिकारी प्रत्येक जिला स्तर पर ऐसे मामलों से संबंधित कार्यों के संपादन के लिए उत्तरदायी होगें।
* यह विधेयक जिला स्तर पर एंटी ट्रैफिकिंग यूनिट गठित करने का प्रावधान करता है। एंटी ट्रैफिकिंग यूनिट (एटीयू) दुर्व्यापार से निवारण, संरक्षण तथा पुनर्वास के लिए उत्तरदायी होंगी तथा जिस जिले में कार्यकारी एंटी ट्रैफिकिंग यूनिट नहीं होंगी वहां पर स्थानीय पुलिस द्वारा यह कार्य किया जाएगा।
* विधेयक राष्ट्रीय, राज्य एवं जिला स्तर पर एंटी ट्रैफिकिंग राहत तथा पुनर्वास कमेटी (एटीसी) के गठन का प्रावधान करता है।
इस अधिनियम को लेकर की जा रही आलोचना के प्रमुख बिंदु हैं (i) यह विधेयक भी पुराने कानूनों की तरह ही सामाजिक समस्या का हल आपराधिक कानून के द्वारा करने की चेष्टा करता है। भारतीय दंड संहिता की धारा 370 इसे अपराध घोषित करती है। नया विधेयक इसमें पंद्रह नए अपराधों तथा कई खंडों को समाविष्ट करता है जो कि जांच तथा प्रवर्तन के दुरुपयोग को सरल बनाते हैं; (ii) यह विधेयक अपराध, बचाव तथा पुनर्वास के पुराने प्रारूप पर निर्भर करता है तथा किसी भी तरह से दुर्व्यापार के इर्द-गिर्द खंडित कानूनी ढांचे के लिए स्पष्टता प्रकट नहीं करता; (iii) यह विधेयक केवल ‘बढ़े हुए अपराधों के रूप में मौजूदा अपराधों को प्रस्तुत करके और भ्रष्टाचार तथा जटिल प्रवर्तन की जटिलताओं को जोड़कर अधिक भ्रम पैदा करता है; (iv) यद्यपि इस विधेयक को अपनी तरह का पहला विधेयक बताया गया था जो कि व्यापक पुनर्वास प्रदान करता है, परंतु विधेयक पूर्णतः अपराधों को चित्रित करता है बजाय इसके कि वह कोई पुनर्वास मॉडल प्रदान करे; (v) यह विधेयक छापामारी, बचाव तथा पुनर्वास पर निर्भर करता है जो कि वर्तमान स्वरूप में एक व्यस्क महिला के स्वतंत्राता हनन के अलावा कुछ नहीं है। पुनर्वास प्रक्रिया पीड़ितों की इच्छाओं तथा विकल्पों का आदर नहीं करती। विशेषतः यौन श्रमिकों के लिए इस प्रकार का विधेयक एक पितृत्ववादी दृष्टिकोण रखता है तथा इस बात को अनदेखा करता है कि एक व्यस्क महिला निर्णय कर सकती है कि उसके लिए क्या सही और क्या गलत है; (vi) प्रत्येक व्यक्ति को यह निर्णय करने का अधिकार है कि वह पुनर्वास चाहता है कि नहीं और जो पुनर्वास का विकल्प नहीं चुनना चाहते उन्हें उनकी इच्छा के अनुरूप व्यवसाय चुनने की स्वतंत्राता दी जानी चाहिए; (vii) कई पुनर्वास घरों की निराशाजनक स्थिति और पुनर्वास के लिए वैकल्पिक प्रस्ताव की कमी को देखते हुए, विधेयक अपने निर्दिष्ट उद्देश्य को पूरा नहीं करता; (viii) यह विधेयक स्पष्ट नहीं करता कि किन पर मानव तस्करी का आरोप लगाया जा सकता है। यह विधेयक बहुत व्यापक तथा उलझा हुआ है; (ix) विधेयक की अस्पष्टता के कारण ऐसे लोगों को भी दंड दिया जा सकता है जिन्हें अपराध के विषय में कोई ज्ञान नहीं हो जैसे कि ऐसा उस बस चालक को भी दंडित किया जा सकता है जिसके वाहन का उपयोग अपराध में किया गया हो। आवश्यक नहीं है कि वह चालक अपराध के विषय में जानकारी रखता हो; (x) यह विधेयक सुस्थापित मानवाधिकार मानदंडों को उलट देता है जिसके अनुसार, किसी अपराध को सिद्ध करने के लिए साक्ष्य आवश्यक होते हैं। यदि यह विधेयक कानून में परिवर्तित हो जाता है तो अपराधियों पर अपनी निर्दोषता साबित करने का बोझ आ जाएगा। इस प्रकार के मानदंड शायद ही कहीं आतंकवाद रोधी नीतियों के अलावा लागू होते हैं; (xi) विधेयक के अस्पष्ट परिच्छेद तथा प्रत्येक अपराध के लिए निर्धारित दंड के साथ, उन लोगों के लिए भी कठोर है जो कि पहले से ही कमजोर वर्ग से हैं तथा हाशिए पर जीवन जीते हैं। ऐसे लोग जिनकी शिक्षा तक पहुंच नहीं है, कानूनी अधिकारों और प्रक्रियाओं के बारे में कम जागरूक हैं, के लिए यह विधेयक मुश्किलें खड़ी कर सकता है; (xii) विधेयक के कुछ खंड महिलाओं के लिए असंगत प्रभाव डालने वाले हो सकते हैं, विशेषकर उन महिलाओं के लिए जो कि असंगठित क्षेत्रों में कार्य करने हेतु पलायन कर रही हैं। जिनमें यौन श्रमिक तथा वो महिलाएं हैं जो अपने साथी के साथ घर से भाग गई हैं। विस्तृत जांच शक्तियों तथा स्थानों को बंद करने की क्षमता के साथ विधेयक द्वारा महिलाओं की गतिशीलता पर निगरानी होने तथा प्रतिबंध लगने की संभावना है; (xiii) विधेयक तस्करी के दौरान होने वाली गर्भावस्था को एक गंभीर अपराध बनाता है जिसका न्यूनतम दंड दस वर्ष कारावास है। इसी प्रकार से विवाह के लिए या विवाह के बहाने की जाने वाली तस्करी के लिए अस्पष्ट प्रावधान हैं; (xiv) विधेयक यौन श्रमिकों के खिलाफ पुलिस द्वारा की जाने वाली हिंसा को भी नजरअंदाज करता है, जो कि एक चिंता का विषय है।
सरकार को विधेयक की अस्पष्टता को दूर कर इन अपराधों को रोकना तथा पीड़ितों को संरक्षण प्रदान करना चाहिए। कानूनों को अपराध रोकने के लिए कठोर तथा संरक्षण तथा पुनर्वास के लिए व्यापक दृष्टिकोण वाला होना चाहिए। प्रत्येक मनुष्य को अधिकार है कि वह एक गरिमापूर्ण जीवन जिए जिसके लिए आवश्यक हो जाता है कि पीड़ितों को उचित सहायता प्रदान की जाए। कानून का प्रारूप समाज तथा मानव जीवन के उत्थान हेतु सकारात्मक भूमिका निभाए तभी वह कानून ऐच्छिक परिवर्तन लाने में सक्षम हो सकता है।